उम्मीद के दीये
बुझते आशाओं के पग पर
जलते उम्मीदों के दिए
कुछ जले अपने खातिर
कुछ औंरों के लिए
छोड़ अंदर का दामन
हम सूरज की और चल दिए
इस तरह दिल मैं अपने
जल उठे ख़ुशी के दीये
-स्वाति शर्मा
शब्द दीप !
दीप जलाये मनोभाव के
सौ-सौ लड़ियों वाले दीप
अनगिन खुशियों वाले दीप।
एक दीप उस द्वार भी जले
खुले जो रहा कई बरस
रौशनी को जो रहा तरस।
एक दीप उन दीवारो पर
जो पपड़िली रुखड़ी सी हैं
घोर तामस में उखड सी हैं।
दीप धरो उन ताखे पर भी
जिस पर माँ की मूरत है
कितनी खूबसूरत है।
दीप जलाओ ओसारे में
बाबा जिसमें रहते थे
जुग-जुग जियो कहते थे।
दीप जले तुलसी चौरे पर
देती नित आशीष हमें
खुशियों की बख्शीश हमें।
एक दीया उस देहरी आर धार
राह तक राह परदेशी का
दिन लौटे उस घर में ख़ुशी का।
एक दिया कवि के चरणों में
जिसकी कृतियाँ थाती हैं
सच की राह दिखती हैं।
दिया एक उन चौबारों पर
जो अतीत की गाथा कहते है
वर्तमान की घाते सहते।
एक दीप उन के मंदिर में
क्लेश द्वेष सब दूर करें
नेह छोह के भाव भरें।
-अभिनव अरुण
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